भाजपा : देवतुल्य कार्यकर्ताओं पर हार का ठिकरा क्यों फोड़ा जा रहा है

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प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव के परिणाम आ गए। भाजपा इस बात से खुश है कि उसे कांग्रेस से अधिक सीट मिली है। नगरपालिका और नगर परिषद में भाजपा का प्रदर्शन काफी बेहतर है। जिन नगर निगम में भाजपा का महापौर नहीं है, उनमें से भी ज्यादातर में भाजपा के बिना परिषद चल नहीं पाएगी। लेकिन 2014 और 2015 में दो अलग अलग चरण में हुए पिछले चुनावों में भाजपा ने सभी 16 नगर निगम में महापौर का पद हासिल किया था, इस बार ऐसा नहीं हो सका है।
अब इन चुनाव में मिली जीत का श्रेय लेने और हार का ठिकरा फोड़ने में भाजपा के भीतर एक अलग तरह का संघर्ष नजर आ रहा है।खुद को कार्यकर्ता आधारित दल और अपने कार्यकर्ताओं को देवतुल्य बताने वाली भाजपा के भीतर नेताओं का एक समूह हार के लिए त्रिदेव को जिम्मेदार ठहरा कर बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को कठघरे में खड़ा कर रहा हैं।
यह बिल्कुल सच है कि नगरीय निकाय चुनाव की मतदाता सूची के पुनरीक्षण से लेकर पर्ची वितरण तक का काम इस बार नहीं हुआ। भोपाल में परिवार पत्रक छपे लेकिन बंटे नहीं।
लेकिन क्या इस सबके लिए बूथ स्तर का कार्यकर्ता वाकई जिम्मेदार है?
जरा विचार कीजिए …
(1)जब मतदाता सूची का पुनरीक्षण चल रहा था तब राजधानी भोपाल में कम से कम दो सक्रिय स्थानीय विधायकों ने इस पर बात की थी। मतदाता सूची को दोबारा बनाया जाए यह मांग उठी थी। लेकिन इसे विधानसभा चुनाव हार चुके एक बड़े नेता ने आगे नहीं बढ़ने दिया। कार्यकर्ताओं को किसी ने कहा ही नहीं कि पुनरीक्षण पर नजर रखे। फिर बीएलओ यानी सरकारी कर्मचारी उसका काम कितना असरकारी होता है, यह सब जानते हैं।
(2) इसके बाद चुनाव टलते चले गए, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इतनी तेजी से सब कुछ हुआ कि फील्ड में जाने का किसी को समय नहीं मिला।
(3) मतदाता सूची कार्यकर्ता तक पहुंची ही नहीं, पर्चियां बनी ही नहीं। एक महिला नेता याद कर रहीं थीं कि वे भाजपा की सदस्यता लेने के पहले से अपने मोहल्ले की पर्चियां बनातीं थीं। लेकिन इस बार तो कुछ भी नहीं हुआ। अब इसके लिए कार्यकर्ता कैसे जिम्मेदार?
(4) भाजपा के नेता इस चुनाव के लिए कितने तैयार थे इसके दो उदाहरण देता हूँ। इससे आप सोचिएगा कि जिम्मेदार कौन है?
(i)नगरीय निकाय और विधानसभा / लोकसभा चुनाव की मतदाता सूची अलग अलग होती है, यह बूथ के कार्यकर्ताओं को बताया ही नहीं गया। बूथ के कार्यकर्ताओं तक मतदाता सूची पहुंची ही नहीं। फिर पन्ना प्रभारी क्या करें?
(ii) मतगणना की तैयारी के लिए बैठक हुई। किसी कार्यकर्ता ने सवाल पूछा कि वार्ड में महापौर और पार्षद की मतगणना एक साथ होगी या अलग अलग? इस सवाल का जवाब नगर निगम चुनाव लड़ चुके नेताओं के पास भी नहीं था। उन्हें यह भी नहीं पता कि एक ही मशीन से दोनों बैलैट यूनिट जुड़ीं हुईं हैं।
(5) बूथ कमेटी का जो सेटअप है वह विधानसभा/ लोकसभा के हिसाब से है। बरसों से वन बूथ टेन यूथ की बात करने वाली भाजपा में पीढ़ी परिवर्तन हो गया, लेकिन नई पीढ़ी के कार्यकर्ता को दोनों चुनाव की तैयारी में अंतर नहीं समझाया गया।
(6) चुनाव प्रबंधन के लिए 1952 से अब तक के आंकड़े जुटा कर एनालिसिस करने वाली भाजपा के पास नगरीय निकाय चुनाव का डेटा उपलब्ध नहीं है। क्या यह भी कार्यकर्ता की जिम्मेदारी है?

भोपाल में किस विधानसभा क्षेत्र में आज क्या स्थिति
भोपाल महापौर के परिणाम को गौर से देखने पर पता लगता है कि जिस गोविंदपुरा में सबसे कम मतदान बताया जा रहा था, वहां सबसे अधिक वोट मिले। हुजूर में भी 2018 के विधानसभा चुनाव से अधिक वोट मिले। विधानसभा चुनाव में जो दक्षिण -पश्चिम हाथ से निकल गई वहां महापौर को लीड मिली। उत्तर में हार का अंतर कम हुआ। मध्य में 2018 के लगभग बराबर स्थिति रही और नरेला में जीत का अंतर कम हुआ। अब यह भी नेताओं का ही काम है कि वे सवा साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए अभी से सतर्क हो जाएं।

यह ठीक है कि हर जगह चुनावी हार जीत का कारण अलग अलग स्थानीय समीकरण हो सकता है। लेकिन एक बात तो तय है कि उस स्थानीय समीकरण को समय रहते नहीं पकड़ पाने की चूक तो नेतृत्व से हुई है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि जिन नगर निगम में भाजपा मेयर नहीं बना पाई वे सब जन्मस्थली, कर्मस्थली या चुनाव क्षेत्र के रूप में दिग्गजों से जुड़े हुए हैं।‌ भाजपा मूल रूप से एक कार्यकर्ता आधारित दल है, लेकिन कार्यकर्ताओं को हार के लिए दोषी ठहरा कर जीत का श्रेय लेने वाले नेता पार्टी की इस विशेषता पर चोट कर रहे हैं। देखने वाली बात है कि हाईकमान पार्टी में कार्यकर्ताओं का सम्मान बचाएगा या पूरा सिस्टम नेताओं के हिसाब से चलेगा।