कांग्रेस नेता शोभा ओझा ने कहा- बुंदेलखंड पैकेज में मप्र को मिले 3800 करोड़ के घोटाले की जांच से बेनकाब होंगे आरोपी

0
134

भोपाल. मप्र कांग्रेस की मीडिया विभाग की अध्यक्ष शोभा ओझा ने राज्य की पूर्ववर्ती भाजपा सरकार पर आरोप लगाते हुए गुरुवार को कहा कि उनकी सरकार में ‘बुंदेलखंड पैकेज’ में हुए कथित घोटाले की जांच नहीं कराई गई, जिसके चलते इस घोटाले के आरोपी बेनकाब नहीं हो सके। ईओडब्ल्यू ने इसकी जांच शुरू कर दी है। इसमें कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। योजना से जुड़े दस्तावेजों की माने तो 5 टन के पत्थर स्कूटर से ढोए गए थे। पन्ना और छतरपुर में खुलासा हुआ था कि विभाग ने अपने कामों के लिए जिन वाहनों का इस्तेमाल ट्रक, डंपर के रूप में बताया। वे दरअसल मोटरसाइकिल और स्कूटर थे।

शोभा ओझा ने कहा कि प्रदेश की कांग्रेस सरकार द्वारा इसकी जांच राज्य आर्थिक अपराध ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) से कराने के निर्णय सही है। इससे घोटाले के भ्रष्टाचारी अब बेनकाब होंगे। उन्होंने कहा कि पिछली सरकार की गलत नीति, नीयत और भ्रष्टाचार के चलते पूरा पैकेज घोटाला की भेंट चढ़ गया था। घोटाला उजागर होने के बाद इसकी कोई गंभीर जांच नहीं कराई थी। अब मप्र सरकार ने मामले की जांच ईओडब्ल्यू को सौंपा है।

2009 में बना था बुंदेलखंड पैकेज
उन्होंने कहा कि यूपीए की पूर्व केंद्र सरकार के कार्यकाल में साल-2009 में बुंदेलखंड के पिछड़े इलाकों को विकसित बनाने के लिए बुंदेलखंड पैकेज बनाया गया था, जिसमें 7 हजार 2 सौ 26 करोड़ रुपए की कुल राशि में से मप्र के हिस्से में 3 हजार 8 सौ 60 करोड़ रुपए प्राप्त हुए थे, जिनके द्वारा मप्र के हिस्से में आने वाले बुंदेलखंड के पिछड़े जिलों का विकास किया जाना प्रस्तावित था।श्

ओझा ने कहा कि हमारे वचन-पत्र में दिए गए वचन के अनुसार, हम प्रदेश में हुए सभी पुराने घोटालों की जांच करा कर दोषियों को दंडित कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं। बुंदेलखंड पैकेज की जांच आर्थिक अपराध ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) से करवाने का फैसला, भ्रष्टाचारियों और घोटालेबाजों को दंडित करने की हमारी उसी प्रतिबद्धता का जीवंत प्रतीक है।

2200 करोड़ चढ़ गए भ्रष्टाचार की भेंट
मप्र के बुंदेलखंड को केंद्र से विशेष पैकेज के रूप में 3860 करोड़ रुपए मिले थे। इसमें से चार साल में दतिया समेत सागर संभाग को 3226 करोड़ रुपए मिले। राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार इस राशि में से 2800 करोड़ रुपए विभिन्न विभागों द्वारा बतौर एजेंसी व्यय किए गए। आरटीआई से मिली जानकारी, कार्यों व खरीदी गई सामग्री की गुणवत्ता, मजदूरी के भुगतान में हुई गड़बड़ियों आदि के आकलन के आधार पर करीब 80 प्रतिशत यानी करीब 2200 करोड़ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए।

सबसे ज्यादा जल संसाधन विभाग को मिला था फंड
पैकेज से सबसे ज्यादा राशि 1340 करोड़ रुपए जल संसाधन विभाग को मिले थे। इस राशि से उन्हें 6 जिलों में नहर निर्माण और सिंचाई परियोजनाओं के लिए खर्च करने थे। जांच की गई तो सामने आया कि विभाग द्वारा बनवाए गए ज्यादातर बांध और तालाबों में घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया। ये ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाएंगे और भी कई बड़ी तकनीकी खामियां मिली थी। इसके अलावा वन विभाग को चेकडेम के लिए 180 करोड़ रुपए दिए थे। पन्ना और छतरपुर में खुलासा हुआ था कि विभाग ने अपने कामों के लिए जिन वाहनों का इस्तेमाल ट्रक, डंपर के रूप में बताया। वे दरअसल मोटरसाइकिल और स्कूटर थे।

वन विभाग द्वारा कोर एरिया में बनाए गए तालाब खोदे ही नहीं गए। इसी तरह पीएचई में 300 में से 100 करोड़ रुपए में गड़बड़ी मिली। कृषि विभाग के तहत 614 करोड़ से डीजल पंप वितरण,मंडी का निर्माण, वेयर हाउस आदि के कामों में भी शिकायतें मिली। ग्रामीण विकास विभाग के 209 करोड़ रुपए के काम ग्राउंड पर दिखाई ही नहीं दिए।