अलविदा प्रणब मुखर्जी: भारत के 13वें राष्ट्रपति जो बनना चाहते थे प्रधानमंत्री

0
336

नई दिल्ली। भारतीय राजनीति पर गहरी पकड़ रखने वाले प्रणब मुखर्जी को एक ऐसी शख्सियत के तौर पर याद किया जाएगा, जो देश का प्रधानमंत्री हो सकता था, लेकिन अंतत: उनका राजनीतिक सफर राष्ट्रपति भवन तक पहुंच कर संपन्न हुआ।

चार दशक लंबे राजनीतिक कार्यकाल के बाद वर्ष 2012 में प्रणब मुखर्जी देश के प्रथम नागरिक यानी राष्ट्रपति बने थे। मुखर्जी 2012 से लेकर 2017 तक देश के 13वें राष्ट्रपति रहे। अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई अहम फैसले भी लिए । इस पद तक उनका पहुंचना आसान नहीं था। दरअसल राष्ट्रपति पद के लिए यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी की पसंद हामिद अंसारी थे। लेकिन समाजवादी पार्टी सहित कई क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की पसंद प्रणब दादा थे। इससे यह भी पता चला था कि राजनीतिक विभेद के बावजूद प्रणब दा की स्वीकार्यता सभी राजनीतिक दलों में थी।

प्रणब दा का वो सपना अधूरा ही रहा गया

हालांकि राष्ट्रपति बनने से प्रणब दा का वो सपना अधूरा ही रहा गया, जिसके लिए राजनीतिक हलकों में हमेशा चर्चा होती थी। यह सर्वविदित था कि यूपीए और कांग्रेस पार्टी के भीतर प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत और बड़े दावेदार थे। इसी वजह से उन्हें पीएम इन वेटिंग भी कहा जाता था। लेकिन उनकी किस्मत में सात रेसकोर्स रोड नहीं बल्कि राष्ट्रपति भवन का पता लिखा था। अपनी जीवनयात्रा पर लिखी पुस्तक “द कोलिशन इयर्स- 1996 – 2012” में खुद प्रणब मुखर्जी ने इस बात का खुलासा किया था कि वो प्रधानमंत्री बनना चाहते थे।

अपनी किताब ‘‘द् कोलिशन इयर्स’’ में मुखर्जी ने माना कि मई 2004 में जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया था तब उन्होंने उम्मीद की थी कि वह पद उन्हें मिलेगा। उन्होंने लिखा है, ‘अंतत: उन्होंने (सोनिया) अपनी पसंद के रूप में डॉक्टर मनमोहन सिंह का नाम आगे किया और उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया। उस वक्त सभी को यही उम्मीद थी कि सोनिया गांधी के मना करने के बाद मैं ही प्रधानमंत्री के रूप में अगली पसंद बनूंगा।’ मुखर्जी ने यह स्वीकार किया था कि शुरुआती दौर में उन्होंने अपने अधीन काम कर चुके मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में शामिल होने से मना कर दिया था लेकिन सोनिया गांधी के अनुरोध पर बाद में वह सहमत हुए।

राष्ट्रपति के रूप में एक अमिट छाप छोड़ी

राष्ट्रपति के रूप में भी उन्होंने एक अमिट छाप छोड़ी। इस दौरान उन्होंने दया याचिकाओं पर सख्त रुख अपनाया। उनके सम्मुख 34 दया याचिकाएं आईं और इनमें से 30 को उन्होंने खारिज कर दिया। इनमें 2008 मुंबई हमलों के दोषी अजमल कसाब और 2001 में संसद हमलों के मुख्य आरोपी अफजल गुरू को फांसी दिया जाना शामिल है। जनता के राष्ट्रपति के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले मुखर्जी को राष्ट्रपति भवन को जनता के निकट ले जाने के लिए उठाए गए कदमों के लिए भी याद किया जाएगा। उन्होंने जनता के लिए इसके द्वार खोले और एक संग्रहालय भी बनवाया।