Madhya Pradesh BJP : मध्य प्रदेश भाजपा में 30 साल में नहीं पनप पाया अजा-आदिवासी नेतृत्व

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भोपाल। Madhya Pradesh BJP मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी इन दिनों संकट के दौर से गुजर रही है। पिछले 28-30 साल में अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग में पार्टी का नया नेतृत्व स्थापित नहीं हो सका। आदिवासी वर्ग में फग्गन सिंह कुलस्ते का पार्टी के पास आज तक कोई विकल्प तैयार नहीं हुआ। यही हालात अनुसूचित जाति (अजा) वर्ग के साथ है, यहां थावरचंद गहलोत का भी विकल्प पार्टी के पास नहीं है। ये सभी नेता अब 60 से 70 की उम्र के आसपास हैं। भाजपा के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी इसे लेकर चिंतित है।

भाजपा के पास आदिवासी चेहरे के नाम पर एकमात्र आदिवासी नेता फग्गन सिंह कुलस्ते और अजा वर्ग में केंद्रीय मंत्री गहलोत हैं। दूसरा ऐसा बड़ा कोई चेहरा नहीं, जिसकी प्रदेश भर में पहचान हो। यही कारण है कि पिछले विधानसभा चुनाव में मालवा-निमाड़ से लेकर मंडला-डिंडौरी, अनूपपुर, उमरिया, बालाघाट, छिंदवाड़ा, बैतूल सभी जिलों में भाजपा को भारी नुकसान हुआ। नेतृत्व संकट का बड़ा कारण नए चेहरों को आगे आने नहीं देना रहा। चाहे मालवांचल में विजय शाह, रंजना बघेल, अंतरसिंह आर्य हों या महाकोश्ाल में ज्ञानसिंह जैसे नेता हों। अजा वर्ग में लालसिंह आर्य को पार्टी आगे बढ़ाना चाहे तो बाकी नेता उनकी घेराबंदी कर देते हैं।

मध्य प्रदेश में अजा और आदिवासी वर्ग ही सरकार बनाने में अहम भूमिका अदा करता है। जब-जब ये दोनों वर्ग भाजपा से दूर हुए, तब-तब सरकार में परिवर्तन होता है। वर्ष 1990 में संयुक्त मध्य प्रदेश के दौर में भी भाजपा की सरकार सिर्फ आदिवासी सीटों के भरोसे बनी थी। 1993 और 1998 में जब यही वोट बैंक कांग्रेस में चला गया तो कांग्रेस की सरकार बनी। 2003 के चुनाव में आदिवासी भाजपा के साथ आए। तब प्रदेश में आदिवासी सीटों की संख्या 41 थी, जिसमें भाजपा को 34 और कांग्रेस को सिर्फ दो सीट मिली थी। परिसीमन के बाद 2008 के चुनाव में अजा सीट 47 हो गई, भाजपा के खाते में 29 सीट ही आईं। इस चुनाव में कांग्रेस को 17 सीट मिली थी। 2013 के चुनाव में फिर भाजपा को 32 और कांग्रेस को 15 सीट मिलीं। पिछले साल में हुए विधानसभा चुनाव 2018 में कांग्रेस ने 30 आदिवासी सीट और 17 अनुसूचित जाति की सीट जीतकर भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया।