मध्यप्रदेश में उपेक्षा का शिकार हुआ लता मंगेशकर पुरस्कार

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भोपाल। भारत रत्न से अलंकृत स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर के नाम पर मध्यप्रदेश सरकार द्वारा स्थापित ‘लता पुरस्कार” उपेक्षा का शिकार होता जा रहा है। तीन साल होने को आए पुरस्कार के लिए संस्कृति विभाग को कोई पात्र नहीं मिला।

सरकार ने 2012 से 2016 तक के पुरस्कार एक साथ बांटकर औपचारिकता पूरी की थी तब भी 2013 और 2014 के पुरस्कार वितरित नहीं हो पाए। अब 2017 एवं 2018 के पुरस्कार लंबित हो चुके हैं, 2019 भी खत्म होने को है। इस तरह पांच साल के पुरस्कार फिर एक साथ दिए जाने की स्थिति बन रही है।

सुगम संगीत के क्षेत्र में दिए जाने वाले इस पुरस्कार की देशभर में बड़ी प्रतिष्ठा है। पुरस्कार को लेकर शुरुआती दो दशक तक सरकार ने गंभीरता दिखाई, लेकिन बाद में इसकी अनदेखी होने लगी। वर्ष 1984 में मप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने लताजी के सम्मान में यह पुरस्कार शुरू किया था।

दो दशक के बाद में धीरे-धीरे इसकी गरिमा कम होती गई। इसे राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगा और कार्यक्रम औपचारिकता का शिकार हो चला। 2016 तक के पुरस्कार संस्कृति विभाग को एक साथ बांटने पड़े, क्योंकि 2012 से इन्हें बांटा नहीं गया था।

2017 में हुए कार्यक्रम में 2012, 2015 और 2016 के पुरस्कार क्रमश: गायक उदित नारायण, ऊषा खन्ना और अनु मलिक को दिए गए लेकिन 2013 एवं 2014 के पुरस्कार बंटने से रह गए। इन्हें क्रमश:पार्श्व गायिका अलका याग्निक और संगीत निर्देशक बप्पी लाहिड़ी को दिया जाना था लेकिन तब ये दोनों कार्यक्रम में आ नहीं पाए थे।

उस वक्त एलान किया गया था कि एक-दो माह में पुन: कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, लेकिन इस बात को भी दो साल बीत गए कार्यक्रम नहीं हो पाया।

यही स्थिति अब बन रही है, 2016 के बाद के पुरस्कार दिया जाना बाकी हैं। उल्लेखनीय है कि लता मंगेशकर ही ऐसी जीवित शख्सियत हैं, जिनके नाम पर पुरस्कार दिए जाते हैं। मप्र ने राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 1984 में इसकी शुरुआत की थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने इंदौर में लताजी की मौजूदगी में इसकी घोषणा करते हुए कहा था कि ‘बहन घर आई है उनके सम्मान में यह करना आवश्यक था।”

कम हो गया पुरस्कार का क्रेज

सरकार ने उस वक्त निर्णय किया था कि गायन व संगीत के क्षेत्र का सर्वोच्च ‘लता मंगेशकर पुरस्कार कार्यक्रम” हर साल लताजी की जन्मस्थली इंदौर में आयोजित किया जाएगा। शुरुआती दौर में तो इस कार्यक्रम का क्रेज इतना अधिक रहा कि दूसरे शहरों और राज्यों तक के लोग कार्यक्रम के टिकट और पास के लिए हैरान-परेशान होते थे। कार्यक्रम के दौरान इंदौर का नेहरू स्टेडियम ठसाठस भरा रहता था।

लगातार यह दूसरा मौका है जब पुरस्कार लंबित हो गए। वर्ष 2013, 2014, 2017 एवं 2018 के पुरस्कार दिए जाने हैं, 2019 भी पूरा होने को आ गया है। कार्यक्रम का आयोजन अटका पड़ा है। पुरस्कार के लिए बुनियादी प्रक्रिया भी शुरू नहीं की गई।

गरिमा घटने से मंत्री भी आहत, कहा- पुन: इसकी भव्यता लौटाएंगे

प्रदेश की संस्कृति मंत्री डॉ. विजयलक्ष्मी साधौ भी ‘लता पुरस्कार” की अनदेखी को लेकर आहत हैं। वह कहती हैं कि ‘पूर्ववर्ती सरकार की कथनी-करनी में फर्क था, मैंने स्वयं 1994 से चार साल तक बतौर विभागीय मंत्री ये पुरस्कार बांटे, तब इसकी गरिमा देखते ही बनती थी। अब तो यह कार्यक्रम एक हॉल में सिमट कर रह गया। पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने इसकी क्या गत कर दी सबके सामने है।”

डॉ. साधौ ने बताया कि हमने इस साल से पुरस्कार की राशि बढ़ाकर दो लाख रुपए करने की घोषणा विधानसभा में की है। इस पुरस्कार की गरिमा पुन: बहाल करेंगे। इस साल दिसंबर में यह कार्यक्रम विस्तृत और भव्य स्वरूप में आयोजित किया जाएगा।