मध्य प्रदेश के राज्यपाल की किताब : नेहरू ने बता दिया था कांग्रेस के बाद कौन करेगा राज!

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भोपाल। मध्य प्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन की प्रकाशित होने वाली पुस्तक देश के सियासी और सामाजिक जगत में हलचल मचाने के साथ कई रोचक तथ्यों का राजफाश करेगी। इसमें चौंकाने वाला तथ्य प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जुड़ा है, जिसमें कहा गया है कि उन्होंने चीन युद्ध के बाद यह भान करा दिया था कि कांग्रेस के बाद देश का नेतृत्व जनसंघ (अब भाजपा) करेगा। पूर्व में टंडन की ‘अनकहा लखनऊ’ नामक पुस्तक विवादित व सुर्खियों में रह चुकी है। राज्यपाल टंडन ने अपने लगभग 70 साल के सामाजिक और राजनीतिक जीवन के दौरान संपर्क में आए देश-विदेश की दिग्गज शख्सियतों के साथ अपने संस्मरणों के जरिए कुछ ऐसी बातें भी लिपिबद्ध की हैं जो मौजूदा धारणाओं को तोड़ती हैं। इसमें सभी दलों के नेताओं से जुड़े छोटे-छोटे संस्मरण हैं, जिनके जरिए उनके मन में झांकने की कोशिश भी दिखती है।

नेहरू के बारे में वह लिखते हैं कि संस्कार और शिक्षा से अंग्रेज और व्यवहार से उन पर मार्क्सवाद-पूंजीवाद का असर दिखता था, लेकिन सबके सामने उनका समाजवादी स्वरूप रहा। चौंकाने वाली बात यह भी है कि चीन से हुई 1962 की लड़ाई हारने के बाद नेहरू मन से टूटने लगे थे। अस्वस्थ भी रहे, इस बीच वह कुछ समय मित्र पत्रकारों के साथ चाय पर चर्चा भी करते थे, तब उनकी चिंता थी कि इतनी विभिन्नताओं वाले इस देश को मेरे बाद कौन संभालेगा? कोई पार्टी नजर नहीं आती। वहां मौजूद लोगों ने कुछ विकल्प सुझाए, जिन पर उनकी प्रतिक्रिया ‘नॉट सो’ थी।

अंतिम समय नेहरू के दिमाग में जनसंघ ही विकल्प के रूप में रहा। यह बात नेहरू ने जब अपने सहयोगी मंत्री कृष्ण मेनन से कही, तब वहां लखनऊ के पत्रकार सलीमुद्दीन उस्मान भी मौजूद थे। उस्मान ने भारी विस्मय के साथ टंडन को स्वयं यह किस्सा सुनाया था। पुस्तक में नेहरू की गुरु गोलवलकर से चर्चा का ब्योरा भी चौंकाएगा। पुस्तक में संसद में जनसंघ के दो सदस्यों में अटलजी का विदेश नीति पर पहला भाषण सुन नेहरू इतने प्रभावित हुए कि शाबाशी देकर अटलजी को ‘वुड बी पीएम” कहने वाला दृष्टांत भी है। पुस्तक को लेकर जब राज्यपाल लालजी टंडन से बात की तो उनका कहना था कि शीर्षक अभी तय नहीं है, लेकिन फरवरी अंत तक पुस्तक छपने की संभावना है।

एक व्यक्ति, जिसने देश के टुकड़े करा दिए

लखनऊ कांग्रेस अध्यक्ष रहे खलीउलजमा का प्रस्ताव ही बंटवारे का आधार बना था। पाकिस्तान जाकर वह मंत्री-गवर्नर भी रहे। विभाजन के बाद उनके लखनऊ लौटने के संस्मरण भी इस पुस्तक में हैं। टंडन ने बंटवारे पर सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान की नाखुशी और अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े कुछ रोचक प्रसंग भी लिखे हैं। बसपा सुप्रीमो कांशीराम और मायावती के साथ खट्टे-मीठे रिश्ते और नवाबों की विरासत लखनऊ के मौजूदा स्वरूप से लेकर ऐतिहासिक प्रसंगों के जरिए ऐसे दृष्टांत भी हैं।

संघ व जनसंघ भी शामिल

जनसंघ का निर्माण उसके प्रति युवाओं का आकर्षण, द्वारका प्रसाद मिश्र की सभाएं, मुखर्जी की मौत के बाद नेताविहीन जनसंघ और संघ पर प्रतिबंध पर भी टंडन की कलम चली है। आजादी के बाद कांग्रेस की उपयोगिता खत्म होने और उसकी पुण्याई के दोहन की चर्चा भी है। सरदार पटेल और उनके जल्दी देहावसान, नेहरू मंत्रिमंडल में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी और डॉ. बीआर आंबेडकर के न आने और फिर महात्मा गांधी की नाराजगी के बाद आंतरिक सरकार में दोनों को शामिल किए जाने की कहानी भी चौंकाएगी।